वरफअ्ना लक जिकरक…

है यह फरमान है खुदा जिसकी है आलम में धमक
यह वह आयत है जिसे पढ़ते हैं सब हूरों मलक
वरफअ्ना लक जिकरक…

मेरी मय्यत को ना तुम बागो चमन में रखना
खाके तयबाही फक़त मेरे कफन में रखना
ताकि मिलती रहे जन्नत में भी तैबा की महक

चुमके केहते थे दिहलीज़े नबूवत को बिलाल
तेरे टुकड़ों पे पले गैर की ठोकर पे न डाल
क्यों ना गुन गाऊ तेरा खाता हूं जब तेरा नमक

ऊस्ने ईमां से जो देखे वो सहाबी हो जाए
फूल तो फूल है कांटा भी गुलाबी हो जाए
रूए पुर नूर की मिलजाए अगर एक झलक

जिसकी तौसीफ मे पुरनुर सहीफा उतरा
जिसकी तारीफ में कुरान का पारा उतरा
ऐसा आबिद है कि मद्दाह है माबूद तलक

केसे तस्कीन यह पाएगी उदासी आंखें
हसरते दीद की सरकार है प्यासी आंखें
ख्वाब ही में सही सरकार दिखा दीजे झलक

आला हजरत सा में वो यार कहां से लाऊं
मद्हे सरकार में यफ्कार कहां से लाऊं
है असद दिल में मेरे मिदहते आका की ललक

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